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जलवायु परिवर्तन को महामारी की तरह लेना जरूरी, बीमारी जैसी उभर रही ग्लोबल वार्मिंग

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नई दिल्‍ली. आपने वो कहानी तो सुनी होगी, जिसमें घाट पर पैर फिसल जाने की वजह से रानी की कमर टूट जाती है, जब दोषी की ढुंढाई मचती है, तो सबसे पहले पानी डालने वाले पर इल्जाम मढ़ा जाता है, वो दोष मसक (चमड़े का बर्तन जिसमें पानी भरा जाता है) बनाने वाले पर लगा देता है, मसक बनाने वाला दोष बकरी बेचने वाला पर लगाता है, तो बकरी बेचने वाला बकरी पर यह कह कर दोष लगाता है कि वो उसे इतना खाने को देता था लेकिन वो खाती ही नहीं थी. इस तरह राजा इस निर्णय पर पहुंचता है कि बकरी ही दोषी है और उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाता है.

हाल ही में पेरिस में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर शिखर सम्मेलन हुआ, जिसका नतीजा कुछ इसी दोष मढ़ने की तरह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका. और नौ दिन चले अढ़ाई कोस की तर्ज पर सारे देश अपने-अपने घर लौट गए. इस पूरे मामले में इस बार भी फांसी बकरी (आम जनता) को ही चढ़नी है. कनाडा में ऐसा ही एक मामला सामने आया है. जो संभवत: पहला ऐसा मामला जिसमें एक बुजुर्ग महिला के सरदर्द और डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) की शिकायत के लिए जलवायु परिवर्तन पर इल्जाम लगाया है. चिकित्सक का कहना है कि जलवायु संकट पर दोष लगाना ठीक वैसा ही जैसे किसी कुल्हाड़ी को कुल्हाड़ी कहना. तमाम तरह के सबूत और बता रहे हैं कि लोगों के बीमार होने की वजह जलवायु परिवर्तन है और दिक्कत यह है कि हम लक्षणों का इलाज कर रहे हैं, बीमारी का नहीं क्योंकि हमने जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग को अभी तक बीमारी के तौर पर लेना शुरू नहीं किया है.

क्या था रोग का निदान
इस साल उत्तरी गोलार्ध की गर्मियों में प्रशांत उत्तरीपश्चिमी इलाका अभूतपूर्व गर्म हवाओं में भुन गया था. यह वो इलाका है जहां हल्की फुल्की गर्मी पड़ती है और यहां पर रहने वालों के दिमाग में कभी एयरकंडीशन लगाने का विचार भी नहीं आता है, ना ही उन्हें इसे लगाने की कभी ज़रूरत पड़ी. लेकिन इस बार दिन में चलने वाली लपट ने तापमान ने ऐसी उछाल मारी की लोगों को ऐसा लगा कि वो या तो भुन जाएंगे या पिघल जाएंगे. इन गर्मी ने सैंकड़ों लोगों की जान ले ली. ब्रिटिश कोलंबिया के कनाडाई प्रांत के एक अस्पताल के आपातकाल विभाग में लोगों की भीड़ बड़ने लगी. डॉ कायल मैरिट ने देखा घुटन और डिहाइड्रेशन के लक्षण वाले मरीजों की भीड़ लगी हुई थी. यहां तक जंगल में लगी आग के धुएं ने लोगों में सांस संबंधी दिक्कते खड़ी कर दी थी. उन्होंने मीडिया को बताया कि एक 70 साल की बुजुर्ग महिला को देख कर साफ लग रहा था कि उसके आस पास की घटनाओं से उसकी दिक्कतें लगाता बढ़ती जा रहीं थी.

डॉ मैरिट ने देखा कि वह मरीज जिसे डायबिटीज और दिल की बीमारी थी, उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी और वो खुद को हाइड्रेट (पानी की कमी पूरी करना)रखने में संघर्ष कर रही थी. उन्होंनें पाया कि वह मरीज एक ट्रेलर में रहती थी. उसके पास एयर कंडीशन जैसा कुछ नहीं था. इसी दौरान डॉ मैरिट ने फैसला किया कि वह महिला की स्वास्थ्य समस्याओं के पीछे जलवायु परिवर्तन है. इन्होंने स्थानीय मीडिया को बताया कि इस बात को सामने लाने के पीछ बस यही विचार था कि जितना इसे समझा जा रहा है या बात उससे कहीं ज्यादा गंभीर है.

डॉक्टर ने इस मामले को जलवायु परिवर्तन में क्यों रखा
डॉ मेरिड ने मीडिया को बताया कि अगर हम वजह को नहीं देखें और सिर्फ लक्षणों का इलाज करें तो हम लगातार पिछड़ते जाएंगे. साथ ही यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि जिसका इलाज हो रहा था वह एक गरीब महिला थी जिससे यह साफ हो जाता है कि जलवायु परिवर्तन का बुरा असर गरीबों और गरीब देशों पर ज्यादा पड़ेगा.

आधिकारिक तौर पर उत्सर्जन, प्रदूषण और वैश्विक जलवायु संकट पर आरोप लगाकर सरकारों पर दबाव बनाया जा सकता है कि वो इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करें.
2020 में लंदन में इसी तरह का एक मामला सामने आया था जब एक 9 साल के बच्चे ऐल्ला रोबर्टा की 2013 में मौत हो गई थी. उसकी मृत्यु के पीछे वायु प्रदूषण को वजह बताया गया था. वह बच्चा सांस की दिक्कत को लेकर दो साल तक लगातार अस्पतालों के चक्कर काटता रहा. डॉक्टर का मानना था कि वायु प्रदूषण ने उसके अस्थमा की हालत को और बिगाड़ दिया था. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन में नियामकों को सख्त करने की बात की जानी चाहिए.

स्वास्थ्य जर्नल के संपादक ने मेडिकल जर्नल बीएमजे में एक खुला पत्र लिखा है जिसमें कहा गया है कि वैश्विक तापमान के बढ़ने और प्राकृतिक दुनिया के नष्ट होने से पहले ही स्वास्थ्य में गिरावट आ रही है, यह बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ कई दशकों से सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य को खतरा कितना असली
बीएमजे में लिखे गए खुले पत्र में बताया गया है कि ऐसे लोग जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक है, उनमें गर्मी की वजह से होने वाली मृत्यु की दर पिछले 20 सालों में 50 फीसद से अधिक बढ़ गई है, यही नहीं जलवायु परिवर्तन का नकारात्मक प्रभाव बच्चों, बड़ों सहित, कमजोर लोगों और तबके को भी पड़ रहा है. उच्च तापमान की वजह से डिहाइड्रेशन, किडनी की परेशानी, त्वचा से जुड़ी दिक्कतें, मानसिक सेहत, गर्भावस्था, दिल की परेशानियां बड़ी हैं.

यूएन की रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन के डेटा के हवाले से बताती है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से हर साल 1.5 लाख लोग जान गंवा देते हैं. और इस आंक़ड़े के 2030 तक दोगुना होने का अनुमान है. यही नहीं तापमान बढ़ने से अफ्रीका जैसे देशों में मच्छरों की आबादी बड़ेगी जिससे मलेरिया, डेंगू और अन्य वेक्टर जनित बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ेगा.

अगर यह पता भी चल जाए कि बीमारी की वजह जलवायु परिवर्तन, तब भी क्या लाभ, दवा तो है नहीं. विशेषज्ञों के मुताबिक जिस तरह से डॉ मेरिट ने इसे जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाला मान कर अपने मरीज की दिक्कतों पर ध्यान दिया, इस तरह से तत्काल लिए गए फैसलों से गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है.

रिपोर्ट बताती है कि डॉ मेरिट ने एक समझदारी भरा कदम उठाया, दुनियाभर के दूसरे स्वास्थ्य पेशेवरों को भी इसी तरह की सोच के साथ काम करना होगा. और यह सोचना होगा कि जलवायु परिवर्तन गंभीर स्वास्थ्य दिक्कतों की वजह हो सकता है. अध्ययन से हम इसके अन्य नतीजों पर भी जल्दी ही पहुंच जाएंगे, लेकिन साथ ही दुनियाभर की सत्ताओं को भी इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि दोष लगाने के बजाए कदम उठाना ही एकमात्र उपाय रह गया है.

Tags: Climate Change, Global warming



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