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Stubble Burning: फिर आया पराली जलाने का मौसम, आखिर क्यों यह है किसानों की एक अनसुलझी समस्या ?

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नई दिल्ली: सर्दिया का मौसम आते ही उत्तर भारत में प्रदूषण (Pollution) एक बड़ी समस्या बन जाती है. विशेष रूप से पंजाब (Punjab), हरियाणा (Haryana), दिल्ली एनसीआर (Delhi NCR) और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में अधिक विकराल होती है. इसका मुख्य कारण पंजाब हरियाणा और यूपी के किसानों का अपने खेतों पर पराली (Stubble) जलाना है. फसलों को जलाने से इन क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता काफी खराब हो जाती है. इन राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है.

प्रदूषण की समस्या दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी परेशानी बन गई है. अब तो यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है. जब जब पराली जलाए जाने पर अंकुश की बात होती है तब तब सिर्फ राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप ही सामने आते हैं. अभी तक किसानों के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे पराली को न जलाया जाए.

दो फसलों के बीच काफी कम अंतर
दरअसल पंजाब और हरियाणा में गेहूं और धान की फसल सबसे अधिक मात्रा में उत्पादित की जाती है. माना जा रहा है कि पराली जलाए जाने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि धान की फसल की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच इतना समय नहीं मिल पाता कि किसान पराली को कहीं और शिफ्ट करें और रह किसान के पास पराली के को रखने की जगह भी नहीं है इसलिए किसान गेंहूं की फसल को जल्दी बोने के लिए खेतों में ही पराली पर आग लगा देता है.

2009 के पंजाब प्रिजर्वेशन ऑफ सबसॉइल एक्ट में कहा गया है कि धान की रोपाई की तारीख सरकार की तरफ से 20 जून तय की गई है, जो मई के बजाय चावल की फसल की कटाई को आगे बढ़ाती है, ताकि मानसून में बारिश से पानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा लिया जा सके. हालांकि इससे किसानों के पास दो फसलों के बीच केवल 20-25 दिनों का समय बचा है. गेहूं की बुवाई में देरी से गेहूं की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा इसे देखते हुए किसान धान और दूसरी फसलों के बचे हुए भाग को चला देते हैं. एक रिपोर्ट से पता चलता है कि पंजाब में हर साल 20 मिलियन टन पराली का उत्पादन सिर्फ चावल की फसल से होता है जिसमें से 80% खेत में जला दिया जाता है.

पराली जलाना अपराध के दायरे में
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 2015 में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब राज्यों में फसल अवशेष जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. फसल अवशेष जलाना भी आईपीसी की धारा 188 और वायु और प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत एक अपराध है. हालांकि, पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए सरकार के क्रियान्वयन और इसकी जांच में अभी भी बहुत कमजोरी है जिसकी वजह से यह समस्या अभी तक बनी हुई है.

सुप्रीम कोर्ट ने शरू की अनोखी पहल
पराली से बढ़ने वाले प्रदूषण की समस्या पर सुप्रीम कोर्ट भी हस्ताक्षेप कर चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कुछ उत्तरी राज्यों को हर उस किसान को 2,400 रुपये प्रति एकड़ देने का आदेश दिया, जो पराली नहीं जलाते थे. हालां कि कोर्ट की यह पहल ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई क्योंकि राज्यों ने किसानों को भुगतान ही नहीं किया.

इसके विपरीत पंजाब और हरियाणा ने पराली जलाने वाले किसानों को दंडित करना शुरू किया. सरकार ने किसानों पर भारी जुर्माना भी लगाया लेकिन इन सब नियम कानून के बावजूद पराली जलाने की समस्या में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं दिखा. वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार पराली की समस्या में इसलिए कड़े कानून नहीं लाती क्योंकी इससे किसानों को परेशानी हो सकती है और इसका सीधा असर वोट बैंक पर पड़ सकता है.

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