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क्या था गांधीजी की अस्थियों का राज, जिसे चुपचाप बैंक लॉकर में छिपाया गया

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नई दिल्ली.  90 के दशक में अचानक देश में एक तूफान उठ खड़ा हुआ. पता लगा कि महात्मा गांधी की अस्थियां ओडिशा के एक बैंक लॉकर में छिपाकर रखी हुई हैं.  40 साल से वो एक लकड़ी के डिब्बे में पड़ी हैं. ओडिशा के कुछ अखबारों ने जब इसकी खबरें छपीं तो सवाल उठने लगे कि ऐसा किसने किया. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि ये सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

ये 90 के दशक के बीच की बात है. अचानक ना जाने कैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अंदरूनी सूत्रों ने स्थानीय मीडिया को ये सूचना लीक की कि उनके बैंक में पिछले 40 सालों से महात्मा गांधी की अस्थियां एक लॉकर में छिपाकर रखी हैं. खबर छपते ही तीव्र प्रतिक्रियाएं होने लगीं. किसी को समझ  में नहीं आया कि ऐसा क्यों हुआ है. किसने ऐसा किया. ऐसा करने के पीछे मकसद क्या था.

इस मामले में इतने घुमाव आते रहे कि ये पूरी घटना पहले रहस्य में तब्दील हुई. फिर उसने ओडिशा की राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. कुछ संगठनों ने ये सवाल उठा दिए कि ये अस्थियां महात्मा गांधी की नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस की हैं. इसलिए बैंक में छिपाकर रखी गईं थीं.

मशहूर लेखक पीटर फ्रैंच ने अपनी किताब “लिबर्टी ऑर डेथ” में इसका जिक्र किया है. इंडियन कॉनून. आर्ग ने भी विस्तार से इस पर जानकारी दी है. गांधीजी के पड़पोते तुषार अरुण गांधी ने 1996 में ओडिशा के मुख्यमंत्री, गवर्नर और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन को एक पत्र लिखकर इस बारे में जांच कराने की मांग की. पत्र में उन्होंने लिखा कि उन्हें कुछ प्रेस रिपोर्ट्स से इसका पता लगा है.

उन्होंने लिखा,” अगर वाकई ये खबर सही है कि गांधीजी की अस्थियां कटक के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के लॉकर में रखी हैं तो ये बहुत दुखद है, क्योंकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत व्यक्ति की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलती, जब तक कि उसकी अस्थियां नदियों में प्रवाहित नहीं की जातीं.” उन्होंने पत्र में अनुरोध किया कि अगर इस बारे में कुछ पता लगे तो उन्हें बताया जाए.

स्टेट बैंक के चेयरमैन ये दिया पत्र का जवाब 
तुषार के इस पत्र का जवाब ना तो ओडिशा के राज्यपाल ने दिया और ना ही मुख्यमंत्री ने. अलबत्ता कुछ दिनों बाद स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने जरूर पत्र का जवाब दिया कि वो इसकी जांच जरूर करेंगे. कुछ समय बाद उन्होंने तुषार गांधी को फोन किया और बताया, ये खबर सही है कि गांधीजी की अस्थियां स्टेट बैंक के लॉकर में हैं. ये कटक में बैंक के लॉकर में एक लकड़ी के बॉक्स में हैं. इस बॉक्स पर लिखा है “अस्थीज ऑफ महात्मा गांधी”.

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने फिर एक टाइप किया आधिकारिक पत्र 08 मार्च 1996 को तुषार को भेजा, जिसमें कहा गया था

– 29 नवंबर 1950 ओडिसा के मुख्यमंत्री के सचिव ने 18 इंच गुणा 20 इंच का बॉक्स बैंक लॉकर में जमा किया था.  इसके बदले बैंक ने 29 नवंबर 1950 को उन्हें सेफ डिपाजिट रिसीप्ट नंबर 30/21जारी की.

– बैंक ने इस सेफ का पूरा ध्यान रखा है. ये पूरी तरह सुरक्षित है.

महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने स्टेट बैंक में छिपाकर रखी अस्थियों को लेकर ओडिशा के मुख्यमंत्री और राज्यपाल को दो पत्र लिखे लेकिन किसी का जवाब नहीं मिला

इससे पहले दिसंबर 1994 में बैंक ने एक पत्र ओडिशा के मुख्यमंत्री को लिखा और वो इस सेफ डिपाजिट को निकाल लें लेकिन इस पर कोई जवाब उन्हें नहीं मिला था. चूंकि ये बॉक्स ओडिशा सरकार द्वारा जमा किया गया था लिहाजा ये फैसला उन्हें करना था कि इस लकड़ी के बॉक्स का क्या करना है.

राज्य सरकार ने फिर जवाब नहीं दिया
बैंक से लेटर मिलने के बाद तुषार ने फिर ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री जेबी पटनायक और गर्वनर जी. रामानुजम को एक दूसरा पत्र भेजा. साथ ही राज्य के चीफ सेक्रेटरी को भी उन्होंने पत्र भेजा कि गांधीजी की अस्थियां प्राप्त करने में उनकी मदद की जाए ताकि हिंदू धर्म के अनुसार उनके आखिरी रीति-रिवाज पूरे किए जा सकें. अबकी बार भी उन्हें अपने पत्र का कोई जवाब नहीं मिला.

मुख्यमंत्री ने कहा, ये अफवाह है
तब 21 मार्च 1996 में तुषार खुद ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री जेबी पटनायक से मिलने भुवनेश्वर गए. मुख्यमंत्री ने कहा कि ये बात केवल अफवाह है. इस पर उन्हें विश्वास नहीं करना चाहिए. उन्होंने ये भी कहा कि 1950 में ओडिशा के मुख्यमंत्री नव कृष्ण चौधरी थे. उनके पास कोई सेक्रेटरी नहीं था. फिर सरकार के पास इसका कोई रिकॉर्ड भी नहीं है.

ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री जेबी पटनायक ने पहले तो इस बात अफवाह बताया. फिर कहा कि वो इस मामले की सीबीआई जांच कराएंगे तभी सच्चाई सामने आएगी

पटनायक ने कहा कि वो इस अफवाह से निपटने के लिए एक सीबीआई जांच कराने जा रहे हैं, जिसमें अस्थियों की रसायनिक जांच की जाएगी. पता लग जाएगा कि ये अस्थियां गांधीजी की हैं या नहीं.

मुख्यमंत्री ने इस मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को गलत बताते हुए कहा कि बैंक खुद गलतबयानी कर रहा है, इसलिए सीबीआई जांच पूरे मामले की होनी ही चाहिए. हालांकि सीएम के इस जवाब पर तुषार हैरान हुए कि स्टेट बैंक का कोई जिम्मेदार अधिकारी क्यों ऐसा करेगा.

फिर बैंक को ये हैरानी भरा पत्र भी लिखा
इसके बाद ओडिशा सरकार के सचिव ने 23 मार्च 1996 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, भुवनेश्वर के जनरल मैनेजर (आपरेशंस) को पत्र लिखकर कहा,  राज्य सरकार इस लॉकर में पड़े बॉक्स की जिम्मेदारी नहीं लेती, जिसमें महात्मा गांधी की अस्थियां बताई जाती हैं, लिहाजा बैंक इस बात के लिए स्वतंत्र है कि वो इस बॉक्स का कुछ भी करे.

तब तक इस मामले में कई और संगठन कूद पड़े थे. ये मामला पेचीदा हो गया. इस बीच तुषार भी जब भूख हड़ताल पर बैठ गए तो राज्य सरकार को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा. राज्य सरकार को कहना पड़ा बैंक चाहे तो ये बॉक्स तुषार को दे सकता है लेकिन इस मामले में चूंकि कई संगठन कूद गए थे लिहाजा बैंक ने महात्मा गांधी के पड़पोते को सूचित किया कि अब कोर्ट ही इस मामले में कुछ कर सकता है. अगर वो कोर्ट का आदेश ले आएं तो वो गांधीजी की अस्थियां उन्हें दे सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तुषार गांधी को महात्मा गांधी की अस्थियां मिलीं, जिन्हें उन्होंने 1997 में इलाहाबाद में संगम में प्रवाहित किया

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से की गई अपील 
ऐसी हालत में तुषार गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अज़ीज मुसब्बर अहमदी को 26 मई 1996 में एक पत्र भेजकर अपील की. जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पीआईएल मानकर सुनवाई की. कई हफ्तों बाद फैसला आया कि ओडिशा के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के लॉकर में मौजूद महात्मा गांधी की अस्थियों का बॉक्स गांधीजी के पड़पोते को दे दिया जाए.

फिर संगम में इसे प्रवाहित किया गया
1996 के अंत तक या फिर अगले साल जनवरी में तुषार को लकड़ी के डिब्बे में रखी अस्थियां मिल गईं. तब वो 30 जनवरी 1997 में इलाहाबाद गए, जहां संगम में उन्होंने इसे प्रवाहित किया. लेकिन ये आज तक पता नहीं चल पाया कि आखिर क्यों गांधीजी की अस्थियों को छिपाया गया था. अगर ओडिशा की सरकार ने 1950 में ऐसा किया था तो उसका मकसद क्या था.

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